जय माता दी  (Jai MATA DI)

“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
 

माता शैलपुत्री जी का मंदिर काशी वाराणसी

2020-03-25 05:06:44, comments: 0

 

नवरात्री में देवी दुर्गा के नौ रूपो की पूजा होती हैं। दुर्गाजी पहले स्वरूप में शैलपुत्री के नाम से जानी जाती हैं। शैलपुत्री माँ नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम ‘शैलपुत्री’ पड़ा। नवरात्र-पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है। नवरात्रि में दुर्गा पूजा के अवसर पर बहुत ही विधि-विधान से माता दुर्गा के नौ रूपों की पूजा-उपासना की जाती है। आइए जानते हैं प्रथम देवी शैलपुत्री का मंदिर देश के किस भाग में है और वहा कैसे की जाती है माँ कि पूजा। 

मां दुर्गा को सर्वप्रथम शैलपुत्री के रूप का मंदिर है मरहिअ घाट में जो की वाराणसी में है। यहाँ आज के दिन लोगो की भरी भीड़ रहती हैं। वही लोग लाखो का चढ़ावा भी चढ़ाते है। यहाँ आने वालो में ज्यादा तर महिलाएं रहती हैं, जो अपने सुहाग की लम्बी उम्र की मनोकामना करने माता के चरणो में आती हैं। लोग माता को लाल फूल, लाल चुनरी और मिस्ठान चढ़ाते हैं। लोग बड़े चाव से माता की कहानी सुनते है और उसके बाद मंदिर में महाआरती होती है। माता के इस भव्य रूप के दर्शन के लिए लोग दूर दूर से आते है और मनते मांगते हैं। जो कि पूरी होने पर लोग अगले साल माता के दर पर फिर आते है। कहा जाता है की शिव की धरती कही जाने वाली वाराणसी में माता का यह मंदिर इतना सकतीशाली है, की अपने भक्तो की हर प्राथना सुनती है और उन्हें सही रह पर लाती है। 

 

हिमालय के वहां पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण उनका नामकरण हुआ शैलपुत्री। इनका वाहन वृषभ है, इसलिए यह देवी वृषारूढ़ा के नाम से भी जानी जाती हैं। इस देवी ने दाएं हाथ में त्रिशूल धारण कर रखा है और बाएं हाथ में कमल सुशोभित है। यही देवी प्रथम दुर्गा हैं। यही सती के नाम से भी जानी जाती हैं। उनकी एक मार्मिक कहानी है। माँ सती अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मीं और शैलपुत्री कहलाईं। शैलपुत्री का विवाह भी भगवान शंकर से हुआ। शैलपुत्री शिवजी की अर्द्धांगिनी बनीं। इनका महत्व और शक्ति अनंत है। पार्वती और हेमवती भी इसी देवी के अन्य नाम हैं। माँ को खुश करने के लिए इस मंत्र का उपचारण करे वन्दे वांच्छितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्‌। वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌ ॥

 

 

शैलपुत्री की ध्यान :
वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रर्धकृत शेखराम्।
वृशारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्वनीम्॥

पूणेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्॥
पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥

प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुग कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्॥


शैलपुत्री की स्तोत्र पाठ:
प्रथम दुर्गा त्वंहिभवसागर: तारणीम्।
धन ऐश्वर्यदायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥

त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्।
सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥

चराचरेश्वरी त्वंहिमहामोह: विनाशिन।
मुक्तिभुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रमनाम्यहम्॥

शैलपुत्री की कवच :
ओमकार: मेंशिर: पातुमूलाधार निवासिनी।
हींकार: पातु ललाटे बीजरूपा महेश्वरी॥

श्रींकारपातुवदने लावाण्या महेश्वरी ।
हुंकार पातु हदयं तारिणी शक्ति स्वघृत।

फट्कार पात सर्वागे सर्व सिद्धि फलप्रदा॥

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