जय माता दी  (Jai MATA DI)

“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
 

​प्रतिभा से बढ़कर और कोई समर्थता है नहीं​

2018-03-03 14:21:14, comments: 0


प्रतिभा से बढ़कर और कोई समर्थता है नहीं

बुद्ध को मार डालने का षड्यन्त्र अंगुलिमाल महादस्यु ने बनाया। वह तलवार निकाले बुद्ध के पास पहुँचा और आक्रमण करने पर उतारू ही था कि सामने पहुँचते-पहुँचते पानी-पानी हो गया। तलवार फेंक दी और प्रायश्चित के रूप में न केवल उसने दस्यु-व्यवसाय छोड़ा, वरन् बुद्ध का शिष्य बनकर शेष जीवन को धर्मधारणा के लिए समर्पित कर दिया।             

ऐसा ही कुचक्र अम्बपाली नामक वेश्या रचकर लाई थी। पर सामने पहुँचते-पहुँचते उसका सारा बना-बनाया जाल टूट गया, वह चरणों पर गिरकर बोली-पिता जी मुझ नरक के कीड़े को किसी प्रकार पाप-पंक से उबार दें। बुद्ध ने उसके सिर पर हाथ फिराया और कहा कि ‘तू आज से सच्चे अर्थों में मेरी बेटी है। अपना ही नहीं, मनुष्य जाति के उद्धार का कार्यक्रम मेरे वरदान के रूप में लेकर जा।’ सभी जानते हैं कि अम्बपाली के जीवन का उत्तरार्ध किस प्रकार लोकमंगल के लिए समर्पित हुआ।   

नारद कहीं अधिक देर नहीं ठहरते थे; पर उनके थोड़े-से सम्पर्क एवं परामर्श से ध्रुव, प्रह्लाद, रत्नाकर आदि कितनों को ही, कितनी ऊँचाई तक चढ़-दौड़ने का अवसर मिला।   

वेदव्यास का साहित्य-सृजन प्रख्यात है। उनकी सहायता करने गणेशजी लिपिक के रूप में दौड़े थे। भगीरथ का पारमार्थिक साहस धरती पर गंगा उतारने का था। कुछ अड़चन पड़ी, तो शिवजी जटा बिखेरकर उनका सहयोग करने के लिए आ खड़े हुए। विश्वामित्र की आवश्यकता समझते हुए हरिश्चन्द्र जैसों ने अपने को निछावर कर दिया। माता गायत्री का सहयोग उस महा-ऋषि को जीवन भर मिलता रहा। प्रसिद्ध है कि तपस्विनी अनुसूया की आज्ञा पालते हुए तीनों देवता उनके आँगन में बालक बनकर खेलते रहने का सौभाग्य-लाभ लेते रहे।

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